Prem Chopra को विलन के रूप में देख जब डर गई थी उनकी बेटी, फिल्म के बाद घूरे जा रही थी उन्हें

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ब़ॉलिवुड के सबसे खतरनाक विलन प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra) आज अपना 86वां जन्मदिन सेलिब्रेट कर रहे हैं। उन्होंने बताया के उनके विलन वाले रोल की दहशत ऐसी थी कि फिल्म देखने के बाद उनकी बेटी उन्हें घूरती रही और उनसे बात तक नहीं कर रही थीं।

 

प्रेम चोपड़ा नाम है मेरा'(Prem naam hai mera) सुनते ही ब़ॉलिवुड के सबसे खतरनाक विलन प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra) की याद आ जाती है, जिसने न जाने कितनी फिल्मों मेंं हीरो का जीना हराम कर दिया था। कहते हैं फिल्म में विलन जितने दमदार होते हैं, उस फिल्म में नजर आनेवाले हीरो उनते ही शानदार बन जाते हैं। यानी हीरो की हीरोगीरी काफी हद तक विलन के कैरक्टर पर निर्भर करती है। बॉलिवुड में ऐसे ही कुछ गिने-चुने विलन मे एक नाम प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra) का भी, जो पर्दे पर इतने खूंखार दिखे कि दर्शकों में भी एक अजीब दहशत होती कि पता नहीं वह अब हीरो के लिए कौन सी मुसीबत खड़ी कर दे।

अपने नेगिटव कैरक्टर से फिल्मी दुनिया में अपनी खास पहचान बनाने वाले प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra) आज (23 सितम्बर 2021) को 86वां जन्मदिन सेलिब्रेट कर रहे हैं। 23 सितंबर 1935 को प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra) का जन्म लाहौर में हुआ था और फिर बंटवारे के बाद वह अपनी फैमिली के साथ शिमला आ गए। उनका बचपन इन्हीं पहाड़ की बादियों में गुजरा। शिमला के स्कूल में शुरुआती पढ़ाई के बाद प्रेम चोपड़ा (Prem Chopra)ने पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन किया। उन्हें कॉलेज से ही ड्रामा का शौक चढ़ा और वहां होनेवाले नाटक में काफी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। अपने पैरंट्स के खिलाफ जाकर वह ग्रैजुएशन खत्म करने के बाद ऐक्टिंग का सपना लेकर मुंबई (तब बॉम्बे कहा जाता था) पहुंचे। वह कोलाबा में रहने लगे और स्टूडियो में जा-जाकर अपना पोर्टफोलिया दिखाया करते। मुंबई आकर जब तक फिल्मों में काम नहीं मिला, अपनी लाइफ चलाने के लिए उन्होंने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में काम शुरू किया।

प्रेम चोपड़ा बंगाल, उड़ीसा और बिहार में पेपर सर्कुलेशन का काम देखते, जिसके लिए महीने में 20 दिनों का आउटिंग जरूरी था। वक्त बचाने के लिए लिए चोपड़ा एजेंट को स्टेशन पर ही बुला लिया करते ताकि वह वहां से तुरंत वापस हो सकें। इस तरह से जिस टूर में आमतया 20 दिन लगते चोपड़ा 12 दिनों में ही खत्म कर लिया करते थे। यही बचा हुआ वक्त वह एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकने में लगाया करते थे।

एक दिन उनके साथ एक अजीब वाकिया हुआ। वह ट्रेन से ट्रैवल कर रहे थे और एक अनजान शख्स ने उनसे बातचीत करते हुए पूछा कि क्या वह फिल्मों में काम करना चाहते हैं? चोपड़ा उनके साथ ही रंजीत स्टूडियो पहुंच गए जहां प्रड्यूसर को ‘चौधरी करनेल सिंह’ के लिए एक हीरो की तलाश थी। उन्हें एक फेमस स्टार जबीन जलील के साथ पंजाबी फिल्म ‘चौधरी करनेल सिंह’ में हीरो का रोल मिल गया। उन्हें अपनी डेब्यू फिल्म के लिए तब 2500 रुपये फीस मिली थी। इस फिल्म को पूरा करने में करीब 3 साल लगे थे।

इस दौरान वह हिन्दी फिल्मों ‘वो कौन थी?’, ‘शहीद’, ‘मैं शादी करने चला’, ‘तीसरी मंजिल’ जैसी कुछ बॉलिवुड फिल्में कीं। हालांकि 60 के दशक में चोपड़ा फिल्म को अपना फुल टाइम करियर के रूप में नहीं देख रहे थे। ‘वो कौन थी’ से पहले चोपड़ा ने 4 फिल्में की। फिल्म ‘शहीद’ में सुखदेव का किरदार उनके गिने चुने कुछ पॉजिटिव रोल में से हैं, जो मनोज कुमार ने उन्हें दिया था, जबकि उन दौर में उनके विलन वाले किरदारों की पर्दे पर बाढ़ सी आ गई। साल 1967 में फिल्म ‘उपकार’ के बाद उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ का काम छोड़ दिया और पूर तरह फिल्मों से जुड़ गए।

उनके विलन वाला दौर 1967 से लेकर 1995 तक चला। उनकी जोड़ी ऐक्ट्रेस बिन्दु के ऑपोजिट भी खूब दिखी, जिसमें ‘लगान’ (1971), ‘कटी पतंग’, ‘दो रास्ते’, ‘दाग’, ‘छुपा रुस्तम’ जैसी कई और फिल्में थीं। प्रेम चोपड़ा के जबरदस्त डायलॉग उन्हें बाकी विलन से अलग साबित करते थे। उनके डायलॉग फिल्मों में के डायलॉग से भी अधिक फेमस हुए हैं। जैसे, ”जिनके घर शीशे के होते हैं वो बत्‍ती बुझा कर कपड़े बदलते हैं’, फिल्म ‘अली बाबा चालीस चोर’ में प्रेम चोपड़ा ने कहा था कि ‘बादशाहों का अंदाजा बहुत कम गलत होता है.. और जब गलत होता है, तो वो बादशाह नहीं रहते’, फिल्म सौतन में प्रेम चोपड़ा ने एक डॉयलॉग काफी मशहूर हुआ था, ‘मैं वो बला हूं, जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूं’, मूवी कटी पतंग में डॉयलॉग था, ‘कैलाश खुद नहीं सोचता, दूसरों को मजबूर करता हैं सोचने के लिए’, फिल्म ‘वारिस’ में उन्होंने कहा था, ‘सांप के फन उठाने से पहले मैं उसे कुचलना अच्छी तरह से जानता हूं।’ इसके अलावा ‘प्रेम चोपड़ा नाम है मेरा’ डायलॉग भी खूब फेमस हुआ था, जो राज कपूर ने ही उन्हें सुझाया था।


हालांकि, प्रेम चोपड़ा का मानना है कि पर्दे पर आप जिस तरह का किरदार निभाते हैं लोग वैसा ही इम्प्रेशन आपके लिए पालने लगते हैं। लोग उनके लिए नेगेटिव इम्प्रेशन रखने लगे थे, जिसे वह अपने लिए कॉम्प्लिमेंट ही मानते हैं। प्रेम चोपड़ा का मानना है कि इसी की वजह से उन्हें इतना काम मिला और खुद को बढ़ा पाए। हालांकि, प्रेम चोपड़ा ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में बेटी को लेकर एक किस्सा सुनाया, जो उनकी फिल्म देखकर इस कदर घबरा गई थीं कि उनसे बात तक नहीं कर पा रही थी।

इस इंटरव्यू में उन्होंने बताया, ‘मैं उसे फिल्म प्रीमियर पर ले गया, क्योंकि वह अपने पापा का काम देखना चाहती थी। पूरी मूवी के दौरान वह बिल्कुल चुप रही और हर सीन काफी ध्यान से देख रही थी। जब फिल्म खत्म हुई, हम बाहर निकले और वह मुझे घूरती रही और मुझे उसने बात तक नहीं की। वह काफी सहमी हुई थी। वह सोचने लगी कि अचानक उसके पापा के साथ यह क्या हो गया जो कि घर में जोकर बने घूमते रहते हैं। फिर मैंने उसे बिठाया और समझाया कि उसका जोकर हमेशा जोकर है और जो मैं फिल्मों में करता हूं वह केवल मेरा काम है। मैंने समझाया कि यह जरूरी है क्योंकि तभी हम उसे अच्छे स्कूल में पढ़ा सकेंगे, बड़ी कार खरीद पाएंगे। हालांकि उसे वक्त लगा ये समझने में लेकिन आखिरकार उसे फर्क समझ आ गया था।’

अपनी डेब्यू फिल्म के दौरान ही उन्हें उनकी मां को मुंह के कैंसर का पता लगा और वह चल बसीं। प्रेम चोपड़ा को अब अपनी 9 साल की बहन और 4 भाइयों का भी ख्याल रखना था। प्रेम चोपड़ा अपनी बहन को बेटी ही मानने लगे थे। इसके बाद प्रेम चोपड़ा की शादी के लिए रिश्ता आया और यह रिश्ता था राज कपूर की वाइफ कृष्णा कपूर की बहन उमा का। उमा का यह रिश्ता प्रेम चोपड़ा के पास मशहूर डायरेक्टर लेख टंडन लेकर आए थे। उमा से प्रेम चोपड़ा की शादी हुई और उन्हें तीन बेटियां रकिता, पुनीता और प्रेमा हुईं।

रकिता की शादी जहां राहुल नंदा ( film publicity designer) से हुई, वहीं पुनीता की शादी विकास भल्ला से और प्रेमा की शादी शरमन जोशी से हुई है।


प्रेम चोपड़ा ने पिछले 50 सालों में करीब 350 से भी ज्यादा फिल्में की हैं, जिसमें वे केवल अपने विलन वाले किरदार के लिए ही मशहूर हुए। उन्होंने फिल्मी सफर की शुरुआत 1960 में फिल्म ‘मुड़ मुड़ के न देख’ से की। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाल नहीं दिखा पाई जिसके बाद प्रेम चोपड़ा ने पंजाबी फिल्मों की ओर रुख किया। उनकी मुख्य फिल्मों में ‘हम हिंदुस्तानी’, ‘वो कौन थी?’, ‘शहीद’, ‘मेरा साया’, ‘प्रेम पुजारी’, ‘पूरब’ और पश्चिम’, ‘कटी पतंग’, ‘दो अनजाने’, ‘काला सोना’, ‘दोस्ताना’, ‘क्रांति’, ‘जानवर’, ‘फूल बने अंगारे’, ‘महबूबा’ सहित अन्य फिल्में हैं।

 

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