रिचा चड्ढा ने कहा- फिल्म इंडस्ट्री में ऐक्ट्रेसेस के साथ होता है भेदभाव

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बॉलिवुड ऐक्ट्रेस रिचा चड्ढा इन दिनों अपनी वेब सीरीज ‘कैंडी’ को लेकर सुर्खियों में हैं। रिचा चड्ढा ने महिलाओं की आजादी को लेकर बात की है और कहा है कि मजबूत ओहदों पर औरतों की जरूरत है।

 

ऐक्ट्रेस रिचा चड्ढा जितनी निडर कलाकार हैं, उतनी ही निडर इंसान भी। वे पर्दे पर जितने दमदार किरदार निभाती हैं, असल जिंदगी में उतनी ही दमखम से सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखती हैं। इन दिनों अपनी वेब सीरीज ‘कैंडी’ के लिए चर्चा बटोर रही रिचा के मुताबिक, सच बोलने से कभी डरना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे दूसरों को प्रेरणा मिलती है।

 

सेक्शन 375′ में वकील, ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ में मुख्यमंत्री, ‘लाहौर कॉन्फिडेंशियल’ में रॉ एजेंट और अब ‘कैंडी’ में डीएसपी, आप पर्दे पर लगातार पावरफुल महिलाओं के किरदार निभा रही हैं। क्या आपको लगता है कि असलियत में भी अगर ऐसे मजबूत ओहदों पर महिलाएं हों, तो समाज के लिए बेहतर होगा?

 

100 पर्सेंट। आदमियों ने पावरफुल पोजीशन में रहकर क्या किया है? औरतें लीडरशिप रोल में रहेंगी, तो समाज के लिए निश्चित तौर पर अच्छा होगा, क्योंकि आदमी तो इतने साल रह चुके हैं न, क्या कर दिया उन्होंने! खाली प्रदूषण बढ़ा है, डिफेंस पर खर्च बढ़ा है, स्वास्थ्य और शिक्षा पर कम खर्च हो रहा है। देखिए, एक प्रगतिशील समाज वो होता है, जहां प्रेस को आजादी हो। औरतों को आजादी हो कि वे कितने भी बजे, कुछ भी पहनकर काम पर जा सकें, ऐसा तो है नहीं हमारे देश में, तो हमें मजबूत ओहदों पर औरतों की जरूरत है। इस कोविड महामारी ने भी हमें यही दिखाया है कि न्यूजीलैंड की पीएम जेसिंडा आर्डर्न हों या जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल, इन लोगों ने इस महामारी से अपने अपने देश को बहुत अच्छी तरह से बचाया है, तो बिलकुल वक्त आ चुका है कि औरतें ऐसे ओहदे पर रहें।

वैसे, औरतों का मजबूत ओहदे पर होना हमारे पुरुष सत्तात्मक समाज को कम ही बर्दाश्त होता है। फिल्म इंडस्ट्री में भी ये भेदभाव दिखता है, चाहे पेमेंट में अंतर हो या फीमेल सेंट्रिक फिल्मों से बड़े ऐक्टर्स की दूरी। आपका क्या मानना है इस पर?
बिलकुल सही बात है, लेकिन जिस दिन मर्दों को ये याद आ जाएगा कि उन्हें जन्म किसने दिया है, उनको बर्दाश्त होने लगेगा। आपने सही कहा, हमारी इंडस्ट्री में ये भेदभाव तो है। जैसे ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ मैंने बहुत ही कम, महज सम्मान राशि पर की थी, क्योंकि मुझे लगा कि ये फिल्म करनी चाहिए। मुझे ये भी पता था कि बहुत सारी बड़ी-बड़ी ऐक्ट्रेसेज उस रोल पर नजर टिकाए बैठी थीं। वो तो फिल्ममेकर सुभाष कपूर मुझ पर अड़ गए, तो मैंने नाम की फीस ली है उस फिल्म के लिए। फिर, नेपोटिजम भी रहता है कि बहुत सारे फिल्म इंडस्ट्री के बच्चे हैं, जिन्हें ऐक्टिंग आए या न आए, उन्हें दमदार रोल वाले प्रॉजेक्ट शुरू में ही मिल जाते हैं कि देखो ये कितने बढ़िया हैं, पूरी फिल्म अपने कंधे पर लेकर चल सकते हैं। जबकि, हम जैसे लोगों को ऐसी फिल्में पाने में आठ साल लग जाते हैं। रही बात बड़े ऐक्टर्स के फीमेल सेंट्रिक फिल्मों से दूर रहने की, तो जो इनसिक्योर ऐक्टर हैं, वे ऐसा सोचते हैं। कुछ सिक्योर ऐक्टर्स भी हैं, जिन्हें फर्क नहीं पड़ता। उनमें अली (बॉयफ्रेंड अली फजल) भी हैं, जिन्होंने ‘बॉबी जासूस’ की थी।

वेब सीरीज ‘कैंडी’ में आप पुलिसवाली के रोल में हैं, जो पहले करप्ट होती है। असल जिंदगी में इधर पुलिसवालों की जो छवि बनी है, वो बेबसों को सताने वाली ज्यादा रही है। आप इस बारे में क्या सोचती हैं?

मेरा मानना है कि हर फील्ड में हर तरह के लोग होते हैं। पत्रकारिता में भी ऐसे लोग हैं, जो निडर होकर सच दिखाते हैं। सच को दिखाने के लिए जेल तक जाते हैं। वे उससे भी नहीं डरते। वहीं, कुछ लोग हैं, जो इतने चाटूकार होते हैं, जिन्हें सिर्फ अपने बच्चों की फीस और ईएमआई दिखती है। पुलिस में भी ऐसा ही है। कुछ एकदम करप्ट लोग हैं, जो गुंडों से कम नहीं है, वर्दी वाले गुंडे हैं और कुछ जो ईमानदार हैं, वे खुद बेबस हैं, सिस्टम की मार सह रहे हैं, जिन्हें पगार नहीं मिलती, ड्यूटी पर मौत हो जाती है, तो कहीं न कहीं पुलिस वाले दोनों तरफ से पिसते हैं। मैं उन्हें डिफेंड नहीं कर रही, क्योंकि करप्शन की सच में कोई जगह नहीं है, लेकिन निडर और कायर, भ्रष्ट और ईमानदार हर तरह के लोग हर जगह हैं।

निडर होकर सच बोलने पर नुकसान भी उठाने पड़ते हैं…
(बीच में ही) कुछ नहीं होता नुकसान। ये सोचना भी नहीं चाहिए कि नुकसान हो जाएगा। नहीं होता नुकसान, बल्कि एक वक्त के बाद लोगों को प्रेरणा मिलती है। हौसला मिलता है कि कोई तो है, जो सच बोल रहा है। कई बार सच बोलना इसलिए जरूरी नहीं होता कि हम दिखाएं कि हम कितने ईमानदार हैं, इसलिए जरूरी होता है कि कोई तो बोल रहा है यार, जब सब चुप्पी साधकर बैठे हैं। ये बहुत जरूरी है। हम कब तक डरकर बैठे रहें। सबकुछ हम ही करें। टैक्स भी हम दें, आपको ओहदा भी दें। आप कुछ न करो और हम डरते रहें, ये कैसे चलेगा। ये कविता है कुंवर नारायण की, जो किसान आंदोलन में काफी चल रही है कि वो डरते हैं कि एक दिन डर खत्म हो जाएगा। ये बात सच है। जबकि, किसी भी तरह का डर समाज के लिए अच्छा नहीं है।

मैडम चीफ मिनिस्टर’ में आपने मुख्यमंत्री की भूमिका निभाई। असल जिंदगी में सीएम बनने का मौका मिला, तो क्या बदलाव लाना चाहेंगी?
असल जिंदगी में सीएम का तो पता नहीं, लेकिन मुझे अगर फिल्म इंडस्ट्री की प्रतिनिधि बना दें, तो मैं बहुत सारी चीजें बदलना चाहूंगी। काम के घंटे तय कर दूंगी कि 12 घंटे की ही शिफ्ट होगी। सेट पर जिन लोगों को हमेशा जान का खतरा रहता है, जैसे स्टंटमैन, लाइटमैन, उनके परिवारों के लिए मुआवजा, ऐक्टर्स के लिए मेडिकल और हेल्थ इंश्योरेंस और रॉयल्टी सबको मिलनी चाहिए। हाल ही में कई बुजुर्ग ऐक्टर्स थे, जो बीमार थे, उनके बारे में पढ़कर बड़ी तकलीफ हुई कि उन्होंने लोगों से बोला कि मैं आईसीयू में हूं, मुझे पैसे चाहिए इलाज के लिए। ये सब पढ़कर मेरा बहुत दिल दुखा। जिन लोगों ने पर्दे पर सारी जिंदगी बिताई है, वे इस हाल में नहीं होने चाहिए। ऐसे कलाकारों के लिए कुछ होना चाहिए। ऐसे छोटे-छोटे बहुत सारे बदलाव करना चाहूंगी।

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