कार्तिक के करियर का ‘शाहरुख खान मोड़’, प्रयोगवादी सिनेमा के तौर पर चौंकाने में कामयाब ‘फ्रेडी’

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जाते साल का आखिरी महीना सिनेमा के लिहाज से अच्छा शुरू हुआ है। पुराने फॉर्मूलों पर अटके फिल्मकारों को ये नए सबक सिखा रहा है और नए दौर के नए तरह के सिनेमा को बनाने वालों को ये ओटीटी पर मौजूद दर्शकों का भरपूर प्यार दिला रहा है। नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘कला’ देखने के बाद डिज्नी+ हॉटस्टार की फिल्म ‘फ्रेडी’ देखना एक सिनेदर्शक के नजरिये से काफी अच्छा अनुभव है। दोनों फिल्मों में हालांकि मुख्य किरदारों की जिंदगी के स्याह पन्नों को पढ़ने की कोशिश ही इनके निर्देशकों ने की है, लेकिन अन्विता दत्त की फिल्म जहां इसके सहायक कलाकारों और संगीत से संजीवनी पाती है, वहीं शशांक घोष ने अपनी फिल्म के हीरो कार्तिक आर्यन के लिए सिनेमा में ‘शाहरुख खान मोमेंट’ रच डाला है। कार्तिक ने अपनी एक और फिल्म ‘धमाका’ में भी प्रयोगवादी सिनेमा बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वहां कहानी के वातावरण ने उन्हें धोखा दिया, फिल्म ‘फ्रेडी’ में शशांक ने शुरू से ही पूरा माहौल एक अलग रंग में रच दिया है।

कहानी एक संकोची के प्रतिशोध की
कार्तिक आर्यन बतौर अभिनेता हर बार नया करने की कोशिश कर रहे हैं, इस कोशिश मे ही उनका सुनहरा भविष्य छुपा है। अपने 11 साल के करियर में छह हिट फिल्में दे चुके कार्तिक से सिनेमा को भी बड़ी उम्मीदें हैं। फिल्म ‘फ्रेडी’ में कार्तिक इन्हीं उम्मीदों पर खुद को कसने के लिए आगे आए हैं। किरदार उनका एक दांतों के डॉक्टर का है। पारसी है और शादी के लिए अपनी रिश्तेदार के लगातार दबाव में है। पांच साल से वह सही लड़की की तलाश में भी है, और हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि अब लोग उसका सरेआम मजाक भी उड़ाने लगे हैं। फ्रेडी का अतीत मार्मिक है। उसकी जवानी पर इसका साया अब भी है। और, फिर उसके जीवन में आती है एक शादीशुदा युवती जो अपने पति की हरकतों से परेशान है। दोनों असहज परिस्थितियों में मिलते हैं। सहज होकर अपनी परिस्थितियों से समझौता करते दिखते हैं। मिलते हैं, प्यार करते हैं और फिर सामने आता है वह, जिससे हर किसी का जीवन में कभी न कभी पाला पड़ ही जाता है। उम्मीदों का आईना चकनाचूर होता है। किरमिचें सीने में धंसती हैं, और इंसान जो है, वह छोड़कर कुछ और हो जाता है।

कार्तिक आर्यन का ‘शाहरुख खान मोमेंट’
निर्देशक शशांक घोष की छवि हिंदी सिनेमा में प्रयोगवादी सिनेमा बनाने की शुरू से रही है। नेटफ्लिक्स पर हालिया रिलीज फिल्म ‘प्लान ए प्लान बी’ में वह भले पटरी से पूरी तरह उतरे रहे हों, यहां फिल्म ‘फ्रेडी’ में उनको अपने हीरो का पूरा साथ मिला है। कार्तिक आर्यन में खुद को बार बार साबित करने की एक जिद और जुनून है। एक कलाकार के तौर पर वह करियर के शुरुआती दिनों के शाहरुख खान के रास्ते पर हैं। फिल्म ‘फ्रेडी’ उनके लिए ‘डर’ और ‘बाजीगर’ जैसा मौका भी मुहैया कराती है। एक संकोची स्वभाव के उम्रदराज होते जा रहे डॉक्टर का किरदार निभाने के लिए उन्होंने शारीरिक परिवर्तन करने की भी अच्छी कोशिश की है। क्लोज अप शॉट्स में उनके चेहरे के हाव भाव भी प्रभावित करते हैं। फ्रेडी का बार बार स्त्रीदेह की तरफ आकर्षित होना उनके किरदार की शुरुआती छवियां बनाता है और इन्हीं छवियों के रूपक को वह फिल्म में आगे चलकर तोड़ते हैं, और वाहवाही लूट ले जाते हैं।

दमदार सहायक कलाकारों की कमी
फिल्म ‘फ्रेडी’ ने इसके निर्देशक शशांक घोष को हिंदी सिनेमा में एक ऐसी पायदान दी है जिस पर खड़े होकर वह अपने करियर की बीती गलतियों से सबक ले सकते हैं और आगे की राह सोच समझकर तय कर सकते हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा को ‘वीरे दी वेडिंग’ जैसी एक ऐसी फिल्म दी है, जिसने महिलाओं की दोस्ती के नए मायने दर्शकों को सिखाए हैं। ये एक ट्रेंडसेटर फिल्म है। इस तरह की फिल्मों में अपने दौर के चर्चित कलाकारों का ला पाना ही उनके ब्रांडिंग की जीत है। फिल्म ‘फ्रेडी’ में उनके साथ दिक्कत ये दिखती है कि वह हीरो तो बड़ा ले आए लेकिन उसके आसपास जाने पहचाने या बेहतर अभिनय कर सकने वाले चेहरे जुटाने में नाकाम रहे। फिल्म की पटकथा सिर्फ और सिर्फ फ्रेडी के आसपास ही बुनी गई है। इसमें मूल कहानी के साथ साथ चलने वाले क्षेपक नहीं हैं और न ही फिल्म में कोई दूसरा ऐसा किरदार है जो कार्तिक आर्यन से दर्शकों का ध्यान कुछ देर के लिए ही सही पर हटा सके।

अलाया एफ और परवेज शेख को एक और मौका
निर्देशन और कार्तिक के अभिनय में अव्वल नंबर रही फिल्म ‘फ्रेडी’ की हीरोइन अलाया मशहूर अभिनेता कबीर बेदी की नातिन हैं। उनका मां पूजा बेदी हिंदी सिनेमा का बेलौस अदाकारा रही हैं। अलाया को दर्शक इससे फिल्म ‘जवानी जानेमन’ में देख चुके हैं। यहां वह अपनी पहली फिल्म से बेहतर दिखती हैं लेकिन अभिनय में अभी उनको बहुत कुछ सीखना बाकी है। उनका अभिनय अभी ओढ़ा हुआ लगता है, वह किरदार में खुद को खो देने से चूक रही हैं। फिल्म के लेखक परवेज शेख भी हिंदी सिनेमा में चौंकाने वाली कहानियों से अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते रहे हैं। कंगना रणौत की फिल्म ‘क्वीन’ के बाद से हालांकि उनकी लिखी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर ‘बजरंगी भाईजान’ को छोड़ अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन वह लगातार विविधतापूर्ण कहानियां लिखते जा रहे हैं, वही उनकी असली सफलता है। प्रयोगवादी फिल्मों के शौकीनों के लिए फिल्म ‘फ्रेडी’ इस सप्ताहांत चौंकाने में कामयाब रहने वाली फिल्म है।

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